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कोलैबरेशन

दिल्ली के वसंत विहार में जय नारायण रस्तोगी का पुश्तैनी घर है. वर्षों से उनकी चाहत थी कि डेढ़ मंजिल के इस घर को आलीशान कोठी में बदला जाए, लेकिन सरकारी नौकरी से रिटायर, रस्तोगी जी की जमा पूंजी बच्चों की पढ़ाई और शादी में खर्च हो गई. पैसों के अभाव में घर की कंस्ट्रक्शन मूमकिन न थी. रस्तोगी जी उहापोह में थे. रस्तोगी जी ने मन की बात एक दिन अपने दोस्त सुभाष शर्मा से कही. शर्मा जी को प्रॉपर्टी के मामलों की अच्छी जानकारी थी, सो उन्होंने बिल्डर के साथ कोलैबरेशन की सलाह दे दी. और कहा कि इससे घर तो नया बन ही जाएगा, साथ ही अच्छी रकम भी हाथ आ जाएगी. यह सुनकर रस्तोगी जी को अपने खूबसूरत घर का सपना साकार होता दिखने लगा.
आशीर्वाद प्रॉपर्टीज के एमडी अनिल वाधवा का कहना है कि दिल्ली-एनसीआर में ऐसे मकान मालिकों की कमी नहीं जिनके पास पुश्तैनी प्रॉपर्टी तो है, लेकिन कंस्ट्रक्शन के लिए पैसा नहीं. ऐसे में प्रॉपर्टी मालिक और बिल्डर आपस में कोलैबरेशन यानी समझौता करते हैं कि बिल्डर उस प्लॉट पर तीन से चार फ्लोर की कंस्ट्रशन कर देगा और बदले में वह एक या दो फ्लोर ले लेगा. इस तरह प्लॉट के मालिक को उसी जमीन पर नया घर मिल जाता है और कंस्ट्रक्शन पर खर्च की रकम के बदले बिल्डर फ्लोर ले लेता है, जिसे बेचकर वह अपना निवेश और मुनाफा कमा लेता है.
प्रॉपर्टी मामलों के जानकार सुरेश गोयल का कहना है कि कोलैबरेशन की शुरुआत कैसे और कहां से हुई यह कह पाना कठिन है, फिर भी साउथ दिल्ली के ग्रीन पार्क, पंचशील पार्क, गीतांजली इंक्लेव, साउथ एक्सटेंशन के अलावा उत्तरी दिल्ली के शक्ति नगर और कमला नगर समेत बंग्लो रोड और सिविल लाइंस में, नब्बे के दशक से फैलने लगा था. इसमें कोई दो राय नहीं कि ये सभी ऐसे इलाके हैं जिन्हें दिल्ली की बेहद पॉश कॉलोनियों में शामिल किया जाता है. साथ ही कीमत के करोड़ों में होने से यहां जमीन खरीदना हर किसी के बस की बात नहीं. यही वजह भी है कि इन इलाकों में कोठी की बजाय फ्लोर का चलन बढऩे लगा.
बेस्ट ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर हरजीत सिंह अरोड़ा का कहना है कि किसी बिल्डर के साथ कोलैबरेशन करते हुए उसका बैक-ग्राउंड जरूर देखना चाहिए, जिससे पता चल सके कि उसकी कंस्ट्रकशन क्वालिटी कैसी है और क्या वह वक्त पर काम पूरा कर पाता है या नहीं. साथ ही अगर आपको प्रॉपर्टी मामलों की ज्यादा जानकारी नहीं तो नियम और शर्तें तय कराने के लिए कानूनी सलाहकार की मदद लेना न भूलें.
तय करें नियम व शर्तें
सुप्रीम कोर्ट के वकील सुन्दर खत्री का कहना है कि जब कोई मकान मालिक, बिल्डर के साथ कोलैबरेशन करता है तो निर्माण के दौरान प्रॉपर्टी की पजेशन बिल्डर के पास रहती है, ऐसे में दोनों की आपसी डील में स्पष्टï किया जाए कि बिल्डर कंस्ट्रक्शन के साथ लैंड लॉर्ड को किस दिन हैंड ओवर करेगा. साथ ही कंस्ट्रक्शन किस दिन से शुरू की जाएगी.
उनका यह भी कहना है कि स्पेसिफिकेशन के मामले में बिल्डर्स कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं, इसलिए यही बेहतर होगा कि प्रॉपर्टी की कंस्ट्रक्शन में कौन से मेटीरियल का इस्तेमाल किया जाएगा इसका स्पष्टï उल्लेख हो. जैसे दरवाजों पर चौखट टीक वुड की होगी, खिड़कियों के फ्रेम लकड़ी के होंगे या फिर एल्मूनियम के, किचेन और बाथरूम में कैसी फिटिंग और फिक्सचर्स का इस्तेमाल किया जाएगा. अनिल वाधवा का कहना है कि मौजूदा दौर में कंस्ट्रक्शन कॉस्ट पर 800 रुपये से लेकर 2 हजार रुपये प्रति वर्ग फीट तक का खर्च आता है. यदि बिल्डर फिक्सचर बदलता है तो उसे अच्छा फायदा मिल जाता है, ऐसे में इस बात का ध्यान रखना लाजिमी है.
दिल्ली हाई कोर्ट के अधिवक्ता, अशोक वढ़ेरा का कहना है कि कोलैबरेशन में जमीन का मालिक बिल्डर पर पेनाल्टी क्लाज भी डाल सकता है, क्योंकि कंस्ट्रक्शन के दौरान बिल्डर को रेंट पर किसी दूसरी जगह रहना होगा. ऐसे में यदि बिल्डर वक्त पर पजेशन देने में असफल रहता है तो किराये के साथ उसे और किन चीजों का भुगतान करना होगा, इस चीज को भी एग्रीमेंट में शामिल करना न भूलें. दिल्ली हाई कोर्ट के ही वकील रत्नेश्वर पांडेय का कहना है कि बिल्डर और मकान मालिक के इस एग्रीमेंट को रजिस्टर कराना कतई न भूलें. रजिस्टर होने के बाद एग्रीमेंट की कानूनी महत्ता बढ़ जाती है. साथ ही प्लॉट पर कंस्ट्रक्शन के बाद बिल्डर और मकान मालिक का शेयर कितना होगा, एग्रीमेंट इसका उल्लेख करना भी आवश्यक है.
शेयर का बंटवारा
प्रॉपर्टी मामलों के जानकार और ग्लोबल रियल्टी के डायरेक्टर सुरेन गोयल कहते हैं कि शेयर बांटने के लिए आम तौर पर एक फार्मूले का इस्तेमाल किया जाता है. सबसे पहले प्लॉट की एक्चुअल मार्केट वैल्यू निकाली जाती है और फिर कंस्ट्रक्शन कॉस्ट तय की जाती है. दोनों पार्टियों की जितनी वैल्यू होती है, उसी के मुताबिक उन्हें शेयर मिल जाता है. जैसे प्लॉट की कीमत 60 लाख रुपये हो और कंस्ट्रक्शन कॉस्ट 40 लाख रुपये तो ऐसे में प्लॉट के मालिक का शेयर 60 फीसदी का होगा और शेष बिल्डर का.
प्रॉपर्टी मामलों के जानकार रजनीश मित्तल कहते हैं अथॉरिटी और नगर निगम के नियमों से कई बार प्लॉट पर तीन फ्लोर ही बन पाते हैं. जबकि दोनों पार्टियों में बंटवारा 60 और 40 के अनुपात में करना होता है ऐसे में बिल्डर दो फ्लोर ले लेता है और बाकी हिस्सा नकद के रूप में वह प्रॉपर्टी के मालिक को चुका देता है.
कोलैबरेशन के जरिये बनने वाले घरों की संख्या में दिन-प्रतिदिन तेजी आ रही है और अब दिल्ली के अलावा गुडग़ांव, नोएडा और गाजियाबाद के रामप्रस्थ और वैशाली जैसे क्षेत्रों में भी यह अपने पांव पसार रहा है. प्लॉट होने के बावजूद अगर आपके वित्तीय समस्या से कंस्ट्रक्शन कराने में असमर्थ हैं तो कोलैबरेशन के सहारे नए घर का सपना पूरा कर सकते हैं.

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